Shudhbodh The way of Awareness

वैराग्य

हमें लगता है की जो नंगे घूम रहे है  जिन्होंने ग्रह त्याग किया हुआ या जो लोग भस्म लगए हुए बैठे है जो शरीर को कष्ट दे रहे है वह वैरागी  है मैं तुमसे कहता हूँ उनका वैराग से कोई सम्बन्ध नहीं है उनका राग शरीर को दुःख देने से जुड़ गया है उनका राग ग्रह त्याग भस्म से जुड़ गया है जब तक मनुष्य को यह बोध नहीं हो जाता की तुम शरीर नहीं हो की शरीर को कष्ट देकर तुम्हे सिवाय कष्ट के कुछ नहीं मिलेगा तबतक मनुष्य वैराग को उपलभ्ध नहीं हो सकता जबतक वह स्वयं को शरीर समझने की भूल करता रहेगा जबतक वह शरीर को सुख दुःख देने की भूल करता रहेगा मनुष्य वैराग्यवान नहीं हो सकता सुख और दुःख दोनों शरीर से सम्बन्ध रखते है इनका तुमसे कोई सम्बन्ध नहीं ऐसा स्वयं बोध होने पर ही मनुष्य वैराग को प्रार्प्त हो सकता है I

वैराग किसी के दबाव से स्वीकारा नहीं जा सकता किसी सांप्रदायिक, पंथ, मजहब के कहने से स्वीकारा नहीं जा सकता किसी महापुरुष ने कहा है की वैराग्यवान बनो इसीलिए भी उसको स्वीकारा नहीं जा सकता हो सकता है कुछ समय के लिए किसी सांप्रदायिक, पंथ, मजहब या किसी महापुरुष के कहने पर तुम वैरागय को अपना भी लो और कुछ समय तक ऐसा लग भी सकता है की तुम वैरागी हो गए है परन्तु धीरे धीरे जब समय बीतता जाएगा तो तुम्हारे अंदर जो विकार जो तुमने दबा दिए वह सब काम क्रोध, लोभ मोह, लोग, रागद्वेष कई गुना ताकत से तुम्हारे सामने आ खड़े होंगे तब तुम्हे ये भान होगा की जो तुम अभी तक करते आये सिवाय स्वयं को धोखा देने के अलावा कुछ भी नहीं था जब तुम्हे एहसास होगा तुम्हारे झूठे पैन का की जो मैंने अभी तक किया वह सब झूठ था और मनुष्य इसी झूठ को अपनाता हुआ आ रहा है और सवयं को वैरागी समझने की भूल करता आ रहा है I

वैराग तब उत्पन्न होता है जब मनुष्य को अनित्य का बोध हो जाए जब मनुष्य को आसक्ति का बोध हो जाए जब मनुष्य को शाश्वत का बोध हो जाए  मनुष्य की जागरूकता वर्तमान के प्रति सजक हो जाए तब वैराग्य सवयं प्रकट होता है इसे स्वीकारा नहीं जा सकता इसका बोध स्वयं प्रकट होता है  I

क्षणिक वैराग्य तो हर सादक के जीवन में बहुत बार आता है परन्तु वह वैराग्य विचार मात्र ही होता है जैसे शमशान वैराग्य उत्पन्न होता है परन्तु जैसे जैसे समय बीतता जाता है मनुष्य मोह माया के चक्कर में  पड़ जाता है इसीलिए मैं कहता हूँ की वैराग्य किसी के कहने सुनने से  मत अपनाओ इसे सवयं प्रकट होने दो I

 

जैसे बुध का वैराग्य प्रकट हुआ था जैसे महावीर का वैराग्य प्रकट हुआ था जैसे राजा भरथरी का वैरागय प्रकट हुआ था उन सब का वैराग्य स्वयं प्रकट हुआ था किसी के कहने सुनने से वैराग्य को नहीं अपनाया था  I

वैराग्य का मतलब त्याग नहीं है लोग अक्सर ये भूल कर जाते है की वैराग्य का मतलब सबकुछ छोड़ छाड़ देना है या जंगल में चले जाना है या नंगा रहने वाले वैराग्यवान होते है ऐसा बिलकुल भी नहीं है I

भारत जैसे देश में नानक कबिर कृष्ण इसके बड़े अच्छे उदाहरण है जिन्होंने ग्रस्त होते हुए भी वैरागी का सा जीवन जिया है उन्होंने शादी भी की बच्चे भी पैदा किये तथा अपने घर का लालन पालन भी किया और यह सब करते हुए वह वैराग्य को प्राप्त हुए तथा सत्य का दर्शन भी किया I

जबतक जीवन की वास्तविकता का बोध न हो जाए तबतक वैराग्य प्रकट नहीं हो सकता जबतक यह दुनिया तुम्हे मिथ्या न  लगने लगे तबतक तुम्हारे भीतर वैराग्य प्रकट नहीं होगा I

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